सारण की बेटी: इंसाफ की गुहार या सिस्टम की दबंगई?
सारण, बिहार: आज कलेजा फट रहा है यह लिखते हुए कि जिस बिहार की धरती ने दुनिया को लोकतंत्र सिखाया, वहीं आज लोकतंत्र के रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं। सारण जिले में एक मासूम बिटिया के साथ जो दरिंदगी हुई, वह तो रूह कँपा देने वाली थी ही, लेकिन उसके बाद जो प्रशासनिक गुंडागर्दी की खबरें आ रही हैं, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है।
क्या प्रशासन ही बन गया है अपराधी का ढाल?
हाल ही में एक सोशल वर्कर ने जब पीड़ित परिवार से मुलाकात की, तो जो सच्चाई निकलकर आई वह बेहद डरावनी है। आरोप है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाने के बजाय उन्हें धमकाने में लगा है।
वहाँ क्या हो रहा है, उसे इन बिंदुओं से समझिए:
खुलेआम धमकी: पीड़ित परिवार का आरोप है कि उनकी मौजूदगी में ही प्रशासन के लोग उन्हें डरा रहे हैं ताकि वे मीडिया या बाहरी लोगों से बात न करें।
अंधेरे कमरे का खेल: पीड़ित की बहन का कहना है कि एक महिला पुलिस अधिकारी उसे एक अंधेरे कमरे में ले गई और चेतावनी दी कि "मुँह बंद रखो, वरना अंजाम ठीक नहीं होगा।"
सच को दफन करने की साजिश: क्या प्रशासन को यह डर है कि अगर सच बाहर आया, तो उनकी कुर्सियाँ हिल जाएँगी? अपराधी को पकड़ने के बजाय परिवार का गला घोंटना कहाँ का न्याय है?
सत्ता और मीडिया की चुप्पी पर सवाल
आज बिहार पूछ रहा है— वो बड़े-बड़े नेता कहाँ हैं जो चुनाव में बेटी-बहनों की सुरक्षा की कसमें खाते थे? * क्या इसलिए चुप्पी साधी गई है क्योंकि यहाँ वोट बैंक और जाति का गणित बिगड़ने का डर है?
क्या नेशनल मीडिया को बिहार की इस चीख सुनाई नहीं दे रही?
अब चुप रहने का वक्त नहीं है!
"अगर आज हम नहीं बोले, तो कल हमारे घर की दीवारें भी सुरक्षित नहीं रहेंगी।" बिहार की जनता अब हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगी। जब रक्षक ही डराने लगे, तो जनता को अपनी आवाज़ खुद बुलंद करनी होगी।
हमारी माँगें साफ हैं:
इस पूरे मामले की CBI या उच्च स्तरीय निष्पक्ष जाँच हो।
जिन पुलिसवालों ने परिवार को धमकाया, उन्हें तुरंत सस्पेंड किया जाए।
अपराधियों को ऐसी सजा मिले कि फिर किसी की रूह भी ऐसा सोचने से काँप उठे।
आपकी क्या राय है? क्या बिहार की पुलिस अपनी जिम्मेदारी सही से निभा रही है? अपनी बात कमेंट बॉक्स में लिखें और इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि शासन की नींद खुल जाए।
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