सवालों के घेरे में पूर्व डीएसपी — संपत्ति, संबंध
और सत्ता की परते
किशनगंज के पूर्व डीएसपी गौतम कुमार पर आर्थिक अपराध इकाई का शिकंजा कसता जा रहा है। पूछताछ के दौरान उठे सवालों की बौछार में वे कई बिंदुओं पर स्पष्ट जवाब देने में असहज दिखाई दिए। यही असहजता अब पूरे मामले को और गंभीर बना रही है। आरोप है कि गौतम कुमार एक निजी मोबाइल फोन का उपयोग करते थे,
जो कथित तौर पर उनकी गर्लफ्रेंड के नाम पर था। पूछताछ में उन्होंने उस युवती को रिश्तेदार की बेटी बताया, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि यदि वह सिर्फ रिश्तेदार की बेटी है तो उसके नाम पर महंगे शहरी प्लॉट क्यों खरीदे गए।
बताया जा रहा है कि उस युवती के नाम पर सात महंगे शहरी प्लॉट खरीदे गए। जब यह सवाल उठा कि एक लोक सेवक के पास इतनी बड़ी संपत्ति खरीदने के लिए धन कहां से आया,
तो इस पर संतोषजनक जवाब सामने नहीं आ सका। मामले में यह भी चर्चा है कि कथित गर्लफ्रेंड का संबंध एक विधायक से जोड़ा जा रहा है, हालांकि इस बात से गौतम कुमार इनकार कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि कोई संबंध नहीं है तो इस प्रकार की आर्थिक गतिविधियों में उसका नाम क्यों सामने आ रहा है।
मामले को और गंभीर बनाती है दार्जिलिंग में चाय बागान खरीदने की चर्चा। एक सामान्य पुलिस अधिकारी के लिए इतनी बड़ी संपत्ति का प्रबंधन और निवेश अपने आप में सवाल खड़े करता है।
यह भी कहा जा रहा है कि थानों और पुलिस प्रशासन के संचालन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका अक्सर प्रभावशाली रहती है। ऐसे में यह आशंका भी उठती है कि कहीं यह पूरा नेटवर्क राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत का परिणाम तो नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम में कई अनुत्तरित प्रश्न सामने हैं—
यदि युवती केवल रिश्तेदार है तो उसके नाम पर संपत्ति क्यों खरीदी गई?
इतनी बड़ी संपत्ति के लिए धन का स्रोत क्या है?
क्या इसमें राजनीतिक प्रभाव या संरक्षण की भूमिका है?
और सबसे अहम, क्या यह मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित है या इससे बड़ी परतें खुल सकती हैं?
आर्थिक अपराध इकाई की जांच से इन सवालों के जवाब सामने आने की उम्मीद है। फिलहाल, यह मामला न केवल एक अधिकारी की संपत्ति का, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही का भी परीक्षण बन गया है। यदि जांच निष्पक्ष और गहन हुई तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यवस्था में छिपी कई परतों को उजागर कर सकती है।



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